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Category: व्यापार

इरान युद्ध के असर से फिरोज़ाबाद के काँच उद्योग को नई‑नई चुनौतियों का सामना

लगभग दो सदी से फिरोज़ाबाद को भारत के ‘काँच का शहर’ कहा जाता रहा है। यहाँ का काँच निर्माण न केवल राज्य की औद्योगिक पहचान का मुख्य स्तम्भ है, बल्कि छोटे‑मध्यम उद्यम (MSME) वर्ग में लगभग 1 लाख प्रत्यक्ष कामगारों को रोजगार भी देता है। हालांकि, मध्य‑पूर्व में जारी इरान‑इज़राइल संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल‑बाजार को अस्थिर कर दिया है, जिससे भूमध्य‑औद्योगिक इंधन की कीमतों में अचानक छलांग लगी। इस उछाल ने फिरोज़ाबाद के काँच उद्योग की सूक्ष्म आर्थिक तंत्र को नई‑नई दबावों के घेरे में धकेल दिया है।

पर्याप्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि पिछले दो माह में पेट्रोलियम उत्पादों के सरासरी प्रीमियम 30 % से अधिक बढ़ा है। फीरोज़ाबाद के अधिकांश काँच कारखानों में पुरानी कोयले‑आधारित भट्ठी या डीज़ल‑जनित फर्नेस का उपयोग होता है। इंधन लागत में इस वृद्धि से उत्पादन लागत में 12‑15 % की अतिरिक्त भार उत्पन्न हो रही है, जबकि बाजार में काँच की कीमत में अब तक कोई समान अनुपातिक वृद्धि नहीं हुई। परिणामस्वरूप कई छोटे‑मध्यम इकाईयों ने अपने व्यापारिक प्रबंधन में ‘लॉस‑मैजर्स’ के रूप में नुकसान को दर्ज किया, और कुछ ने उत्पादन को आधा‑आधा कर दिया है।

औद्योगिक नीति के संदर्भ में, मंत्रालय ने पिछले वर्ष MSME‑सेगमेंट के लिए ट्रेंनिंग व सब्सिडी कार्यक्रमों की घोषणा की थी, परन्तु इंधन सब्सिडी‑के तहत कटौती और टॉप‑ऑफ़‑टैक्स में वृद्धि के साथ, वास्तविक सहारा न्यूनतम रह गया है। भारत सरकार के ऊर्जा विभाग ने अक्टूबर 2025 में ‘फ़्लेक्सी‑फ्यूल’ योजना प्रस्तुत की थी, जिसमें काँच उद्योग के लिए 5 % फ्लोरिंग रेट की छूट दी गई थी, परन्तु इस व्यवस्था का विस्तार सीमित रहने के कारण सिर्फ 30 % कारखानों को ही लाभ मिला। इस अंतर को देखते हुए, नीति‑निर्माताओं पर यह सवाल उठता है कि ‘MSME‑समर्थन’ के बैनर के तहत इंधन‑भारी उद्योग को किस हद तक संरक्षण देना आवश्यक है, जबकि समान अवधि में पेट्रोलियम उत्पादों पर आयात शून्य‑शुल्क नीति को धीरे‑धीरे हटाया जा रहा है।

बाजार‑स्तर पर काँच की कीमत में धीरे‑धीरे बढ़ोतरी देखी जा रही है, विशेषकर फ्लैट ग्लास, बोतल‑कांच और टेबल‑टॉप काँच में। निर्माण‑उद्योग, जो इस सामग्री पर भारी निर्भर है, ने लागत‑वृद्धि को अपने परियोजना‑बजट में जोड़ते हुए कई छोटे‑मध्यम कंस्ट्रक्शन फर्मों को ‘पैसे‑बचाने’ की वजह से वैकल्पिक सामग्री, जैसे प्लास्टिक‑कोटेड काच, की ओर रुख करने के लिए मजबूर किया है। उपभोक्ता स्तर पर बढ़ी हुई काँच‑कीमतें घर‑निर्माण और साज‑सज्जा से जुड़े खर्च को असमान्य रूप से बढ़ा रही हैं, जो महंगाई‑के‑दबाव को और तीव्र कर रही हैं।

वित्तीय प्रभाव का आकलन करने पर, भारतीय काँच उद्योग संघ के आंकड़ों के अनुसार, फीरोज़ाबाद के काँच निर्यात में वार्षिक लगभग 20 % वृद्धि होती है, जो राष्ट्रीय निर्यात पोर्टफोलियो का 5 % से अधिक हिस्सा बनाता है। इंधन कीमतों में वृद्धि के कारण निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता घटेगी, जिससे विदेशी मुद्रा आय में गिरावट का जोखिम बढ़ता है। साथ ही, सूक्ष्म‑उद्यमों की वित्तीय स्थिति कमजोर होने के कारण बैंक‑लेन‑डिंग पर ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना अधिक है, जो ऋण‑संकट को जन्म दे सकती है।

सारांशतः, इरान‑इज़राइल संघर्ष से उत्पन्न ऊर्जा‑संकट ने फीरोज़ाबाद के काँच उद्योग को दोहरी दुविधा में डाल दिया है—एक ओर उत्पादन लागत में त्वरित वृद्धि, दूसरी ओर बाजार मूल्य में असमानता। इस स्थिति में नीति‑निर्माताओं को सतत‑ऊर्जा संक्रमण को तेज़ करने के साथ‑साथ अस्थायी रूप से इंधन‑सब्सिडी को पुनः‑समायोजित करने की आवश्यकता है, जिससे उद्योग‑की निरंतरता और रोजगार‑सुरक्षा बनी रहे। केवल तभी फीरोज़ाबाद ‘काँच का शहर’ नाम से नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और नवाचार के मॉडल के रूप में अपनी पहचान को पुनः स्थापित कर सकेगा।

Published: May 4, 2026