आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से नौकरी परिदृश्य बदलता, भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली अनपेक्षित चुनौतियों का सामना
जैसे-जैसे भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीक का उपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है, आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कई क्षेत्रों में स्वचालन के चलते रोजगार के स्वरूप में गंभीर परिवर्तन हो सकते हैं। उत्पादन, लॉजिस्टिक्स, वित्तीय सेवाओं और ग्राहक सहायता जैसे बड़े‑पैमाने के उद्योगों में कार्य‑स्थलों का आंशिक या पूर्ण स्वचालन संभावित है, जिससे श्रमिक वर्ग को पुनःप्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता बढ़ेगी।
वर्तमान में भारत की प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ—जैसे प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना (PMRY), राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (NREGS) और राज्य‑स्तर के कौशल विकास कार्यक्रम—मुख्यतः असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण रोजगार पर केन्द्रित हैं। इन योजनाओं की कवरेज औपचारिक क्षेत्र में AI‑प्रेरित नौकरी विस्थापन को संबोधित करने में सीमित लगती है। उदाहरण के तौर पर, वार्षिक रूप से लगभग 15 लाख औपचारिक कर्मचारियों को विशिष्ट कौशल की कमी के कारण पुनःस्थापित करने के लिए उपलब्ध फंड की तुलना में संभावित विस्थापन के दायरे में दसियों लाख नौकरियों का जोखिम है।
आर्थिक अनुसंधान संस्थानों के डेटा के अनुसार, अगले पाँच वर्षों में भारत में लागू होने वाले स्वचालन प्रौद्योगिकियों से लगभग 7‑8 प्रतिशत कार्यबल को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने की संभावना है। जबकि इस बदलाव से उत्पादकता में बढ़ोतरी और नए तकनीकी नौकरियों का सृजन भी अपेक्षित है, तत्काल प्रभाव देखे जाने वाले कार्यबल की आयु वर्ग, शिक्षा स्तर और कौशल प्रोफ़ाइल के आधार पर असमान रहेगा। विशेषकर मध्यम‑स्तरीय नौकरियों—जैसे डेटा एंट्री, टेलिकॉम कस्टमर सपोर्ट, बुनियादी मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स—जो AI समाधान द्वारा आसानी से स्वचालित हो सकती हैं, वे सबसे अधिक जोखिम में हैं।
नियामकीय ढांचे में अभी तक AI‑विशिष्ट श्रम सुरक्षा मानक स्थापित नहीं हुए हैं। मौजूदा ‘श्रम एवं सामाजिक सुरक्षा कोड’ में स्वचालन के प्रभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे नियोक्ताओं के लिए नौकरी‑हटाने की प्रक्रिया में स्पष्टता नहीं है। इस अनिश्चितता के चलते कंपनियाँ अक्सर तत्काल लागत बचत के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता समाधान अपनाने में संकोच नहीं करतीं, जबकि कर्मचारियों के भविष्य को सुनिश्चित करने वाले पुन:स्थापना उपायों की योजना बनाना अनिवार्य नहीं बना है।
कॉर्पोरेट जवाबदेही पर भी सवाल उठते हैं। कई बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिग्रहण में AI‑चालित प्रौद्योगिकियों का समावेश स्पष्ट है, परंतु उनका सामाजिक उत्तरदायित्व रिपोर्ट में अक्सर ‘कौशल उन्नयन’ और ‘पुनःप्रशिक्षण’ को दायित्व के रूप में उल्लेखित किया जाता है, जबकि वास्तविक क्रियान्वयन की मात्रा सीमित रहती है। इससे सार्वजनिक भरोसा कमज़ोर हो रहा है और नीति निर्माताओं पर दबाव बढ़ रहा है कि वे कंपनियों से निरपेक्ष योगदान तथा व्यावहारिक लक्ष्य तय करने को बाध्य करें।
उपभोक्ता हित के संदर्भ में भी जोखिम स्पष्ट है। AI‑आधारित स्वचालन से उत्पाद लागत घट सकती है, परंतु यदि श्रमिक वर्ग में आय की असमानता बढ़ती रही, तो उपभोक्ता व्यय में अवकाश उत्पन्न हो सकता है, जिससे मध्यम‑वर्गीय खपत का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र में स्वचालन से ग्राहक अनुभव में बदलाव आ सकता है, जहाँ डिजिटल समाधान के साथ मानव संपर्क का अभाव उपभोक्ता संतुष्टि को प्रभावित कर सकता है।
इन चुनौतियों के मद्देनज़र, नीति निर्माताओं को तत्काल दो‑स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है: (i) दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा फ्रेमवर्क को AI‑उत्पन्न रोजगार विस्थापन को समाहित करने के लिए पुनःडिज़ाइन करना, जिसमें विस्तारित बेरोज़गारी भत्ता, काम‑से‑सिक्का (कौशल‑ट्रांसफ़र) फंड और पुन:स्थापना प्रशिक्षण के लिए स्पष्ट मानक शामिल हों; (ii) निजी ख़ेल को नियामक रूप से जोड़ते हुए कंपनियों को स्वचालन के सामाजिक लागत को साझा करने के लिए अनिवार्य कराधान या सामाजिक योगदान मॉडल स्थापित करना।
संक्षेप में, भारत की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के ساتھ-साथ AI‑प्रेरित तकनीकी परिवर्तन के कारण उत्पन्न सामाजिक जोखिमों को संतुलित करना आज नीति‑निर्माताओं, उद्योग और श्रमिक वर्ग के लिए प्रमुख चुनौती बन गया है। बिना सक्षम सुरक्षा जाल और सक्रिय पुन:प्रशिक्षण उपायों के, विशेष रूप से असंगठित कार्यबल के लिये, AI की संभावनाएँ सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती हैं, जिससे कुल राष्ट्रीय समृद्धि पर उल्टा प्रभाव पड़ेगा।
Published: May 6, 2026