जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: व्यापार

अमेरिका-ईरान वार्ता की अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतें स्थिर, भारतीय बाजार पर असर

अमेरिका और ईरान के बीच वैपनिक वार्ता में निरंतर असमंजस के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें स्थिर रही हैं। देर रात यूएस डॉलर में हल्की गिरावट के बावजूद, मौद्रिक नीति में संभावित अस्थिरता ने निवेशकों को सुरक्षित आश्रय के रूप में सोने की ओर मोड़ दिया, जिससे कीमत में कोई उल्लेखनीय उछाल नहीं देखा गया।

भारत के संदर्भ में यह स्थिरता महज दो पहलुओं को प्रभावित करती है—भौतिक सोने की माँग और वित्तीय निवेश दोनों। भौतिक सोने की खपत, जो भारत में कुल सोने की मांग का 70 % से अधिक है, मुख्यतः तीज-त्योहारी सीजन और शादी‑विवाह के लिए होती है। वर्तमान में तीज‑त्योहारों की तैयारी शुरू होने के कारण, रिटेलरों ने कीमतों में कमी की अपेक्षा कर रही थी, परन्तु विश्व स्तर पर कीमतों के स्थिर रहने से रिटेल कीमतें भी सीमित रहेंगे। इससे उपभोक्ताओं पर अत्यधिक मूल्यवृद्धि का बोझ नहीं घटेगा, परंतु आयुर्वेदिक या अनिवार्य खर्चों की तुलना में सोने की कीमत की स्थिरता को लेकर सामान्य संतुष्टि बनी रहेगी।

वित्तीय निवेशकों के बीच, भारतीय रिटायरमेंट फंड और सूक्ष्म निवेशक अक्सर सोने को महंगाई‑से‑रक्षा (hedge) के रूप में देखते हैं। RBI द्वारा सोने पर 10 % आयात शुल्क और कर नीति में कुछ लचीलापन प्रदान करने के बाद, आयातित सोने की लागत में लगभग 15 % का इजाफा हुआ है। इस मूल्यवृद्धि को जटिल बनाते हुए, RBI ने जुलाई‑2025 में सोने के फॉरवर्ड मार्केट को सीमित करने के प्रस्ताव पर विचार जारी रखा, जिससे बाजार में अस्थिरता के संकेत मिलते हैं। वर्तमान स्थिरता भारतीय फंड मैनेजर्स को आरओआई (Return on Investment) की तुलना में जोखिम‑प्रबंधन पर अधिक ध्यान देने का अवसर देती है।

छंनन धातु (सिल्वर) की बात करें तो, वैश्विक औद्योगिक मांग में मंदी के बावजूद, डॉलर के हल्के उतार‑चढ़ाव और विश्वव्यापी इन्वेस्टमेंट कोट में बदलाव ने सिल्वर को एक सीमित हद तक समर्थन दिया है। भारत में सिल्वर का प्रमुख उपयोग औद्योगिक उत्पादन और कलेक्टिबल्स में है, इसलिए कीमतों में छोटे‑छोटे उतार‑चढ़ाव से घरेलू उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, अधिग्रहण लागत में संभावित बढ़ोतरी को नियंत्रित करने हेतु सरकार को आयात शुल्क पुनः समीक्षा करनी चाहिए, ताकि भारतीय विनिर्माण इकाइयों की प्रतिस्पर्धा बाधित न हो।

नियामक दृष्टिकोण से, भारतीय प्रतिभूति नियामक (SEBI) ने अति‑स्पेक्युलेटिव ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगाने के लिए डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग के मार्जिन अनुपात को 25 % से बढ़ाकर 35 % करने का प्रस्ताव पारित किया था। यह कदम विदेशी निवेशकों की अस्थिरता को सीमित करने के साथ-साथ स्थानीय निवेशकों को दीर्घकालिक पोर्टफ़ोलियो निर्माण की ओर प्रोत्साहित करेगा। लेकिन इस नीति का कार्यान्वयन अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बनी रहती है।

संक्षेप में, अमेरिकी‑ईरानी वार्ता की अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय सोने के बाजार में कीमतों को स्थिर रखा है, जिससे भारतीय उपभोक्ता, रिटेलर और वित्तीय संस्थाएँ दोनों को अल्प‑कालिक मूल्य‑स्थिरता का लाभ मिल रहा है। फिर भी, आयात शुल्क, RBI की नीतियों और SEBI के नियामकीय कदमों को स्पष्ट करने की आवश्यकता है, ताकि इस स्थिरता को लम्बे‑समय तक टिकाया जा सके और अर्थव्युक्त के अन्य खंडों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

Published: May 5, 2026