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Category: व्यापार

अमेरिका-ईरान के विवाद से तांबे की कीमत में गिरावट, भारत के बाजार को संभावित जोखिम

पर्सियन खाड़ी में अमेरिकी तथा ईरानी बलों के बीच हुई गोलीबारी के बाद अंतरराष्ट्रीय तांबे की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। लंदन में तांबे के फ्यूचर्स में 2.8% की कमी आई, जिससे वैश्विक धातु बाजार में अस्थिरता बढ़ी। इस मौसमी उछाल ने भारतीय आयातकों, विनिर्माण कंपनियों और ऊर्जा क्षेत्र को सीधे प्रभावित करने की संभावना जताई गई है।

भारत विश्व में तांबे का सबसे बड़ा आयातक है, जहाँ वार्षिक आयात लगभग 2.5 मिलियन टन है। अधिकांश आयात मध्य पूर्व के पोर्ट्स और ऑस्ट्रेलिया से किया जाता है, पर खाड़ी क्षेत्र के तटस्थता के प्रति निर्भरता ने इस मूल्य गिरावट को दोहरा जोखिम बना दिया। कीमत में गिरावट से देरित आयात लागत में लाभ हो सकता है, परंतु निरंतर अस्थिरता निर्यातकों और ट्रेड फाइनैंसिंग संस्थानों के जोखिम प्रबंधन को कठोर बना रही है।

वर्तमान में भारतीय स्टील, धातु, पावर जनरेशन तथा ऑटोमोबाइल कंपनियों ने तांबे के मूल्य में गिरावट को लागत बचत के रूप में बताया, पर साथ ही उन्होंने निर्यात प्रतिस्पर्धा और सप्लाई चेन में संभावित बाधाओं पर आशंका जताई। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने अभी तक इस पर कोई मौद्रिक नीति समायोजन नहीं किया है, पर वैश्विक वस्तु मूल्यों में तीव्र बदलाव से महंगाई के दबाव में पुनरावृत्ति हो सकती है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर परोक्ष असर पड़ने की संभावना है।

नियामकीय दृष्टिकोण से, भारतीय वस्तु एवं सेवा कर (GST) परिषद ने तांबे के आयात पर अतिरिक्त कर राहत देने की संभावना पर विचार किया है, ताकि विनिर्माण सूक्ष्म उद्योगों को कम लागत का लाभ मिले। साथ ही, भारतीय निर्यात विकास परिषद (IEDC) ने आपूर्ति श्रृंखला में विविधीकरण हेतु मध्य पूर्व के अलावा अफ्रीका और अमेरिकी टेम्पलेट्स से आयात बढ़ाने की सिफ़ारिश की है, ताकि एक ही भू-राजनीतिक जोखिम पर अत्यधिक निर्भरता घटे।

समग्र रूप में, अमेरिकी-ईरानी तनाव ने तांबे के बाजार में अल्पकालिक अस्थिरता को तेज किया है, जिसका असर भारतीय उद्योग, आयात लागत और संभावित तौर पर महंगाई पर पड़ेगा। नीति निर्माताओं को निर्यात-आयात विविधीकरण, जोखिम‑प्रबंधन फ्रेमवर्क और कर‑रहित राहत के माध्यम से इस अस्थिरता को कम करने की दिशा में त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।

Published: May 5, 2026