UK की ARIA एजेंसी ने अमेरिकी टेक और वेंचर फर्मों को 50 मिलियन पाउंड सार्वजनिक निधि दी
ब्रिटेन की एडवान्स्ड रिसर्च एंड इन्वेंशन एजेंसी (ARIA) ने हाल ही में अमेरिकी टेक कंपनियों व वेंचर कैपिटल फंडों को कुल 50 मिलियन पाउंड (लगभग 5 अर्ब रुपये) की सार्वजनिक निधि आवंटित की। इस कदम को सरकार ने "बिज़ी, जोखिमभरे वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स" को समर्थन देने के तौर पर पेश किया है, जिसका उद्देश्य यूके को फिर से विज्ञान‑सुपरपावर बनाना है।
ARIA की स्थापना डॉमिनिक कम्बज़ द्वारा की गई थी, जिनकी नीति‑निर्माण पृष्ठभूमि में ब्रेग्ज़िट‑पर‑डेटा और तेज‑गति वाली नवाचार रणनीतियों की झलक मिलती है। एजेंसी को पारम्परिक सरकारी अनुसंधान दलों से अलग, तेज निर्णय‑लेने की प्रक्रिया और कम नियामकीय बोझ पर काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस बार की धनराशि अमेरिकी कंपनियों को दी गई, जिससे भारत सहित अन्य देशों के नीति निर्माताओं ने इस मॉडल की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
भारत में वर्तमान में राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति 2025 के तहत सार्वजनिक‑निजी साझेदारी (PPP) को सशक्त बनाना, स्टार्ट‑अप इकोसिस्टम को फंडिंग प्रदान करना और 'भारी‑ऐतिहासिक' शोध क्षेत्रों में जोखिम‑भरे प्रोजेक्ट्स को समर्थन देना प्राथमिक लक्ष्य है। जबकि ब्रिटेन ने इस तरह का फंड सीधे विदेश में जाने का फैसला किया, भारत की नीति में अभी तक ऐसी प्रवृत्ति नहीं देखी गई है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो 50 मिलियन पाउंड की राशि अपेक्षाकृत छोटी है, परंतु इसका संकेत है कि सार्वजनिक धन का प्रयोग 'विनीचर‑हेवी' मॉडल में बदल रहा है, जहाँ रिस्क‑कैपिटल फर्में फंडिंग का प्राथमिक माध्यम बन रही हैं। इससे दो प्रमुख प्रभाव उत्पन्न होते हैं:
- पहला, उच्च‑जोखिम, उच्च‑रिटर्न प्रोजेक्ट्स को तेज़ी से बाजार में लाने की संभावना, जिससे भविष्य में तकनीकी आयात‑निर्यात संतुलन बदल सकता है।
- दूसरा, सार्वजनिक धन का अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आवंटन, जो घरेलू शोध संस्थानों और स्टार्ट‑अप्स की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को कमजोर कर सकता है, यदि समान समर्थन घरेलू तौर पर नहीं दिया जाये।
भारत में वर्तमान में इंडिया इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इण्डीएटी) और नवीनतम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय (DST) के तहत रचनात्मक फंड उपलब्ध हैं, पर उनका उपयोग मुख्यतः राष्ट्रीय संस्थानों और स्थानीय स्टार्ट‑अप्स तक सीमित रहता है। यदि भारत भी समान सार्वजनिक‑निजी मॉडलों को अपनाकर विदेशी फर्मों को सीधे निधि देगा, तो जोखिम आ जायेगा कि सार्वजनिक धन का प्रवाह घरेलू नवाचार को नहीं, बल्कि विदेशी तकनीक आयात को प्रोत्साहित करे।
नियामकीय पहलू पर नजर डालें तो ARIA ने अपने फैसलों में पारंपरिक सरकारी अनुदान प्रक्रिया की लंबी समीक्षा को टालते हुए, 'ज्यादा तेज़' मान्यता प्रक्रिया अपनायी है। यह मॉडल भारतीय नियामक संस्थाओं, जैसे सेबी और श्रीमान वित्तीय नियमन बोर्ड (RBI), के सामने कई प्रश्न उठाता है: क्या अधिक लचीले निर्णय‑लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और उत्तरदायित्व संरचनाएँ हैं? क्या अनुदानित प्रोजेक्ट्स का मूल्यांकन स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा किया जा रहा है?
भोज्य‑उपभोक्ता हित की दृष्टि से भी इस मुद्दे पर चर्चा आवश्यक है। यदि ब्रिटेन के वैज्ञानिक अनुसंधान को विदेशी कंपनियों द्वारा संचालित किया जाये, तो संभावित लाभ—जैसे नई पेटेंट, तकनीकी निर्यात—लगातार सीधे भारतीय उपभोक्ताओं तक नहीं पहुँच सकते। इसके विपरीत, यदि घरेलू स्तर पर ऐसी निधि को उपयोगी बनाकर तकनीकी हस्तांतरण किया जाये, तो भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल सकती है।
कुल मिलाकर, ARIA की यह पहल एक “सार्वजनिक‑निजी जोखिम‑भित्ति” मॉडल के रूप में देखी जा रही है, जो भारत की वर्तमान नवाचार नीति के लिए दोहरी सीख प्रदान करती है: एक ओर तेज़ फैसलों और उच्च‑जोखिम प्रोजेक्ट्स को समर्थन देने के संभावित लाभ, और दूसरी ओर सार्वजनिक निधियों की पारदर्शिता, राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता और घरेलू R&D क्षमताओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता। नीति निर्माताओं को इन पहलुओं को संतुलित करते हुए, भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाना चाहिए।
Published: May 3, 2026