FDI मंजूरी में 12‑सप्ताह की नई प्रणाली: DPIIT ने काग़ज़‑रहित प्रक्रियाएँ शुरू की
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाला विभाग, विभाग प्रोत्साहन एवं आंतरिक व्यापार (DPIIT) ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के लिए एक नयी 12‑सप्ताह की मंजूरी प्रणाली लॉन्च की है। यह प्रणाली पूरी तरह से डिजिटल है, जिससे काग़ज़‑पर आधारित कार्य‑प्रवाह समाप्त हो जाता है। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से समय‑सीमा घटेगी, प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों को पहले से अधिक भरोसा मिलेगा।
2025‑26 वित्तीय वर्ष में भारत के कुल FDI प्रवाह ने लगभग USD 66 बिलियन का रेकॉर्ड हासिल किया, जिसमें निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिज़िटल सेवाएँ और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रमुख सेक्टर रहे। इस बढ़ते प्रवाह के बीच, पहले की औसत मंजूरी अवधि 4‑6 महीने तक पहुंचती थी, जिससे कई तेज़ गति वाले डील बंद होने से पहले ही रुक जाते थे। नई 12‑सप्ताह (लगभग 3 महीने) की सीमा इस समस्या का समाधान करने की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है।
डिज़िटल SOP (Standard Operating Procedure) के मुख्य घटकों में शामिल हैं:
- इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म‑एडिशन और ई‑साइनिंग के माध्यम से दस्तावेज़ जमा करना, जिससे भौतिक दस्तावेज़ों की लॉजिस्टिक लागत घटेगी।
- ऑनलाइन ट्रैकिंग पोर्टल, जहां निवेशक वास्तविक समय में अपने आवेदन की स्थिति देख सकते हैं।
- डेटा एनीलिटिक्स का उपयोग, जिससे DPIIT को उच्च‑जोखिम वाले आवेदन की जल्दी पहचान और अतिरिक्त जाँच करने की सुविधा मिलेगी।
निवेशकों की शुरुआती प्रतिक्रियाएँ मिश्रित हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बताया कि तेज़ प्रतिपुष्टि और स्पष्ट समय‑सीमा उनके भारत में विस्तार योजनाओं को गति देगी, विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और सॉलिड‑स्टेट बैटरी निर्माण जैसे क्षेत्रों में जहाँ प्रतिस्पर्धा तीव्र है। वहीं, छोटे‑स्तर के स्टार्ट‑अप और एंजल निवेशकों ने संकेत दिया कि नई प्रणाली के लिए आवश्यक तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी सभी राज्यों में समान रूप से उपलब्ध नहीं है, जिससे असमानता पैदा हो सकती है।
नीति‑संकल्प में इस बदलाव की महत्वपूर्ण भूमिका ‘निर्माण भारत 2030’ एवं ‘डिज़िटल इंडिया’ पहलें हैं, जो दोनों ही नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाकर पूंजी के प्रवाह को तेज़ करने की मांग करती हैं। लेकिन आलोचक चेतावनी देते हैं कि 12‑सप्ताह की ‘ग्लास सील’ सीमा के बावजूद, अधिसूचना की कमी, असंगत व्याख्याएँ और विभागीय शक्ति‑संतुलन में अनिश्चितता के कारण समय‑सीमा कभी‑कभी बढ़ सकती है।
उपभोक्ता पक्ष पर भी असर देखा जा रहा है। तेज़ FDI मंजूरी से नई उत्पादन लाइनों की शीघ्रता से शुरूआत संभव होगी, जिससे घरेलू उत्पादों की उपलब्धता बढ़ेगी और आयात पर निर्भरता घटेगी। इससे कीमतों में स्थिरता और रोजगार सृजन में मदद मिलने की संभावना है। परन्तु यदि नियामक निगरानी कमज़ोर रहती है, तो बाजार में विदेशी कंपनियों के अत्यधिक दबाव से स्थानीय छोटे उद्यमों को प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान हो सकता है।
भविष्य की दिशा में, विशेषज्ञों का मानना है कि DPIIT को फॉर्म‑फ़िलिंग के अलावा पोस्ट‑ऑप्रूवल निगरानी में भी डिजिटल टूल्स को विस्तारित करना चाहिए। इस तरह से न केवल मंजूरी के बाद के अनुपालन को बेहतर बनाएँगे, बल्कि ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया की गुणवत्ता को भी बढ़ाएँगे। साथ ही, स्पष्ट ग्रे‑एरिया नियमों को लिखित रूप में प्रकाशित कर निवेशकों को नियामकीय जोखिम से बचाना आवश्यक है।
सारांशतः, 12‑सप्ताह की काग़ज़‑रहित FDI मंजूरी प्रणाली भारत को वैश्विक पूंजी प्रवाह के लिए अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, परन्तु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासनिक क्षमता, डिजिटल पहुँच और नियामकीय पारदर्शिता कितनी दृढ़ता से लागू हो पाती है।
Published: May 5, 2026