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AI मॉडल मिथोस से साइबर खतरा: बैंकों को तेज सुरक्षा तैयारियों की आवश्यकता, कहे DFS सचिव नगराजु
भारत के वित्तीय क्षेत्र में डिजिटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन की गति बढ़ने के साथ, उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल भी तेज़ी से विकसित हो रहे हैं। दीवानी वित्तीय सेवाएँ (DFS) की सचिव, अभिषेक नगराजु ने आज बैंकों को चेतावनी देते हुए कहा कि ‘मिथोस’ जैसे जटिल भाषा‑मॉडल साइबर‑खतरे का नया रूप प्रस्तुत कर सकते हैं। यह चेतावनी वित्तीय संस्थाओं के सुरक्षा ढाँचे में मौजूदा खामियों को उजागर करती है और नियामकों से शीघ्र कार्यवाही की माँग करती है।
मिथोस, जिसे कई अंतरराष्ट्रीय AI कंपनियों ने बड़े पैमाने पर डेटा पर प्रशिक्षित किया है, अपने त्वरित कोड जनरेशन और स्वायत्त निर्णय‑निर्धारण क्षमताओं के कारण अनधिकृत डेटा अभिगमन, फिशिंग और भ्रामक लेन‑देन जैसे जोखिमों को बढ़ा सकता है। यदि बैंकों के भीतर इन मॉडलों को बिना उपयुक्त कंट्रोल के एकीकृत किया गया, तो साइबर अपराधियों को बैंकिंग नेटवर्क में घुसपैठ करने, ग्राहकों के खातों से धन हटाने या संवेदनशील वित्तीय जानकारी को बेचा जा सकता है।
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने हाल ही में AI‑आधारित सेवाओं के उपयोग के लिए दिशा‑निर्देश जारी किए हैं, किन्तु उन नियमों में तकनीकी जोखिमों की विस्तृत सूची का अभाव रहा है। सचिव नगराजु ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा, “रिपोर्टेड मामलों की संख्या बढ़ती है और हमें नियामकीय ढाँचे को विकसित करके उस तकनीकी उन्नति के साथ चलना चाहिए।” उन्होंने RBI, SEBI और अन्य वित्तीय नियामकों से मिलकर एक संयुक्त साइबर‑रिस्क टास्क‑फ़ोर्स गठित करने, नियमित AI जोखिम मूल्यांकन लागू करने और बैंकों को अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट करवाने की सिफारिश की।
बाजार पर संभावित प्रभाव गंभीर हो सकता है। यदि बड़े बैंकों को साइबर‑आक्रमण का सामना करना पड़े तो निवेशकों का विश्वास घटेगा, शेयर‑बाज़ार में अस्थिरता बढ़ेगी और वित्तीय समावेशन की गति धीमी पड़ सकती है। इसके अतिरिक्त, उपभोक्ताओं को अपने खातों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च, जैसे कि दो‑स्तरीय प्रमाणीकरण (2FA) या एन्क्रिप्टेड भुगतान गेटवे, अपनाने पड़ सकते हैं, जिससे ख़र्च में वृद्धि होगी।
कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व के संदर्भ में, विशेषज्ञों का कहना है कि बैंकों को केवल नियामकीय अनिवार्यताओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए; उन्हें सक्रिय रूप से AI‑संबंधित जोखिम प्रबंधन में निवेश करना चाहिए। इसमें असली‑समय में साइबर‑थ्रेट इंटेलिजेंस, मॉडल‑आधारित एन्हांस्ड मोनिटरिंग, तथा कर्मचारियों के लिए नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण शामिल हैं।
उपभोक्ता संरक्षणकों ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि “AI‑संचालित धोखाधड़ी से बचने के लिए ग्राहकों को स्पष्ट सूचना, आसान रीकॉर्स तथा मुआवजा प्रणाली की आवश्यकता है।” उन्होंने बैंकों से कहा कि वे ग्राहक‑सुरक्षा प्रोटोकॉल में पारदर्शिता बढ़ाएँ और किसी भी उल्लंघन की सूचना शीघ्रता से सार्वजनिक करें।
सारांश में, जबकि AI मॉडल जैसे मिथोस वित्तीय सेवा में दक्षता व नवाचार लाने की संभावना रखते हैं, उनका अनुचित उपयोग गंभीर साइबर‑खतरे उत्पन्न कर सकता है। नियामकीय ढाँचे को सुदृढ़, तेज़ और तकनीकी‑उन्मुख बनाकर, बैंकों को भविष्य के जोखिमों के लिए तैयार करना आवश्यक है, ताकि भारतीय वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित और स्थिर रह सके।
Published: May 7, 2026